बॉलीवुड गीतों की बंदिश
इंग्लिश में एक कहावत है “You cannot please everyone”, यानी आप सभी को खुश नहीं कर सकते, वही हिंदी फिल्मी गीतों के लिए भी सच है. पिछले कुछ वर्षों में, ऐसे कई गाने हैं जिन्हें प्रतिबंधित या संशोधित किया गया है या कुछ लोगों या समूहों द्वारा उठाई गई आपत्तियों के कारण कुछ शब्दों को म्यूट कर दिया गया था. ‘One man’s potion is another man’s poison’, यानी जो किसी के लिए औषधि है वो किसी अन्य के लिए ज़हर है. फिल्म के गीतकार या निर्माता को जो पसंद है वह आपत्ति करने वाले पक्ष को स्वीकार्य नहीं है. कारण कई हो सकते हैं - राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक, जातिवादी, द्विअर्थी सामग्री आदि. यहाँ मैं कुछ जानेमाने और कुछ कम लोकप्रिय गीतों पर चर्चा करूँगा जिन्हें बदलाव से गुज़रना पड़ा.
मेरी सूची में पहला गीत मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक, 'आंधी' से है जिसके गाने मेरे पसंदीदा गीतकार, गुलज़ार द्वारा लिखे और मेरे पसंदीदा संगीतकार आरडी बर्मन द्वारा संगीतबद्ध किये गए थे. ये गीत है सलाम कीजिये, आली जनाब आए हैं... ये पांच सालों का देने हिसाब आए हैं, जिसे राजनीतिक कारणों से प्रतिबंधित कर दिया गया था. अब अगर आपने फिल्म देखी है, तो इसमें नायिका के गेट-अप और कहानी के प्लॉट के मामले में श्रीमती गांधी से कुछ समानता थी. अगर आप गाने के बोल सुनें, तो निश्चित रूप से इसमें राजनीतिक पुट था. ध्यान दें कि यह फिल्म उस समय रिलीज़ हुई थी जब देश तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौर से गुज़र रहा था. इसलिए न केवल गीत, बल्कि फिल्म पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था और बाद में जेपी सरकार आने पर ही डीडी पर प्रसारित की गई थी. हालाँकि अब भी आप इस गीत को AIR रेडियो (या फिर निजी स्टेशनों) पर नहीं सुनेंगे और न ही इसे टीवी पर देखेंगे. हालांकि यह यूट्यूब या अन्य ओटीटी चैनलों पर उपलब्ध फिल्म में मौजूद है. यह गीत वास्तव में भारत के किसी भी दौर, किसी भी क्षेत्र के लिए प्रासंगिक है.
मुझे याद है, 90 के दशक में, ऑडिशंस के बाद, मुझे विविध भारती के मुंबई केंद्र के लिए Casual Announcer, यानी आकस्मिक उद्घोषक (आज जिसे रेडियो जॉकी या आर.जे. कहा जाता है) के रूप में चुना गया था और लाइव प्रसारण के दौरान एक सप्ताह के प्रशिक्षण से गुज़रना पड़ा था (आकस्मिक उद्घोषक एक अस्थायी उद्घोषक होता है जिसकी सेवाओं की आवश्यकता तब पड़ती है जब किसी दिन स्थायी रूप से आकाशवाणी द्वारा नियुक्त उद्घोषक नहीं आने वाला हो. ये और बात है कि जब मेरे पास प्रसारण करने के लिए पहली कॉल आई तो मेरी हिम्मत नहीं हुई, और फिर मुझे कभी कॉल नहीं आया).
ये डिजिटल से पहले के दिन थे जब स्पूल या एलपी रेकॉर्ड पर गाने बजाए जाते थे. 'आंधी' के रेकॉर्ड के जैकेट (कवर) पर इस गीत का नाम काट दिया गया था जो कि ऑन-एयर उद्घोषकों के लिए संकेत था यह गाना नहीं बजाया जाना है. मुझे यकीन है कि अगर किसी ने गलती से ऐसा किया होता, तो उसकी नौकरी तो यकीनन गई थी.
मेरी सूची में दूसरा गीत है - मेरा नाम आओ, मेरे पास आओ... तेरा नाम आओ, तो मेरा नाम जाओ - जो देव आनंद अभिनीत 'ये गुलिस्तां हमारा' नामक एक कम ज्ञात फिल्म से है और इसे भी राजनीतिक कारणों से खामियाज़ा भुगतना पड़ा. गीत के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि यह उन केवल दो गीतों में से एक है जिसे डैनी ने हिंदी फिल्मों में गाया है (इसके अलावा दूसरा है 'काला सोना' का गीत सुन सुन कसम से जो खुद डैनी पर फिल्माया गया है). वैसे उल्लेखित, विवादित गीत महान हास्य अभिनेता, जॉनी वॉकर और जयश्री टी. पर फिल्माया गया था. अब पढ़ने वाले को हैरानी होगी कि गीत की पंक्तियों में इतना विवादित क्या है. खैर, फिल्म की कहानी भारत-चीन सीमा पर एक छोटे से गांव पर आधारित है. और गीत को जिस तरह से संगीतबद्ध करके गाया गया है, उससे उसमें नाम और आओ शब्द के बीच कोई गैप नहीं है और इसलिए यह सुनने में 'माओ' (महान चीनी नेता माओ-त्से-तुंग) जैसा लगता है. बहुत अजीब बात है ना? खैर, किसी विवाद या मुश्किल से बचने के लिए, गीत को बरकरार रखा गया, लेकिन फिल्म में मेरा/तेरा नाम आओ वाले हिस्से को हर जगह बस काट दिया गया है. तो संपादन के बाद यह गीत स्क्रीन पर बहुत ही अजीब और अर्थहीन लगता है. हालांकि पूर्ण गीत ऑडियो रूप में उपलब्ध है. (संगीत प्रेमियों को इसे पढ़ने के बाद पूर्ण गीत और सम्पादित संस्करण, दोनों को सुनना चाहिए).
सूची के अगले गीत को, उस गीत में प्रयुक्त शब्द के कारण सामाजिक मुद्दों की वजह से संपादित करना पड़ा था. 80 के दशक या उससे पहले पैदा हुए सभी लोगों ने इसे जरूर सुना होगा. यह गोविंदा और करिश्मा कपूर अभिनीत फिल्म खुद्दार से है. जो अलीशा चिनॉय द्वारा गाया गया यह एक डांस गीत है जिसके बोल थे सेक्सी, सेक्सी, सेक्सी मुझे लोग बोलें, हाय सेक्सी, हैलो सेक्सी, क्यू बोलें. मीडिया में सेक्सी शब्द के बारे में बहुत बातें उछली थी, यहाँ तक कि फिल्म रिलीज़ के लिए गाने को बेबी, बेबी, बेबी मुझे लोग बोलें, इस तरह से पुनः डब करके फिल्म में डालना पड़ा जिसमें हर जगह सेक्सी की जगह बेबी कर दिया गया. रिलीज़ से बहुत पहले जारी किए गए ऑडियो टेप में गीत जैसा था वैसा ही रहा (पहले से बिक चुके और वितरित हो चुके टेप्स का कोई क्या कर सकता है).
हालाँकि, यहाँ एक दिलचस्प बात ध्यान देने योग्य है. इस विवाद से कुछ महीने पहले, उसी स्टार जोड़ी की एक और फिल्म में एक गाना था, मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी, ये रूमाल भी सेक्सी है. लेकिन ये गाना अछूता रहा. कैसे और क्यों? मेरे दिमाग में कोई जवाब नहीं आता सिवाय इसके कि निर्जीव वस्तु जैसे शर्ट या पैंट को सेक्सी कहा जा सकता है, लेकिन लड़की को नहीं. या फिर किसी लड़के द्वारा इस शब्द का इस्तेमाल करना ठीक है लेकिन लड़की के लिए नहीं?
चर्चा के तहत अगले दो गाने हैं जिनका संपादन किया गया है - एक गैर-फिल्मी एल्बम का टाइटल सौंग आयशा (नदीम-श्रवण संगीतकार जोड़ी के नदीम द्वारा गया) और दूसरा - या मुस्तफा, या मुस्तफा. इन नामों को बदलकर 'सायशा' और 'या दिलरुबा' कर दिया गया क्योंकि गाने में जो मूल नाम थे वे इस्लामी धार्मिक ग्रंथों में उल्लेखित दो चरित्रों के नाम हैं. इसी तरह 'हम' के प्रसिद्ध गीत जुम्मा चुम्मा दे दे, जुम्मे के दिन किया चुम्मे का वादा को रीलिज़ के दौरान फिल्म में सेंसर नहीं किया गया था, हालांकि इसे सरकारी रेडियो पर अनौपचारिक रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया था (यह वह समय था जब कोई निजी चैनल नहीं थे और आकाशवाणी का एकाधिकार था). कारण शायद जुम्मा शब्द का प्रयोग था जिसका अर्थ शुक्रवार होता है और इसमें खुले तौर पर चुंबन का निवेदन भी था.
अब आते हैं उन गानों पर जिनमें कुछ जातिवादी संदर्भों के कारण उनमें संशोधन और संपादन की आवश्यकता पड़ी. एक फिल्म जिसने व्यावसायिक रूप से बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन सादगीपूर्ण प्रस्तुति और इरफ़ान खान के अभिनय के कारण मुझे ये फिल्म काफी पसंद आई थी. इसका फिल्म का नाम था बिल्लू. यह कृष्ण-सुदामा की कहानी का एक आधुनिक संस्करण था जहां नायक इरफान, पेशे से बिल्लू नमक नाई की भूमिका निभाते हैं. अब मूल रूप से फिल्म का नाम 'बिल्लू बार्बर' रखा गया था. लेकिन विशिष्ट समुदाय के विरोध के बाद नाम को छोटा करके सिर्फ बिल्लू कर दिया गया. इसके अलावा, शीर्षक गीत में, गुलज़ार द्वारा लिखे गए बिल्लू भयंकर के मुखड़े में एक हिस्सा था, बिल्लू से बड़ा हज्जाम नाही रे, सारी दुनिया में ऐसा कौनो नाम नाही रे, जिसे रिलीज़ के समय इस जातिसूचक शब्द को म्यूट करना पड़ा. अब अगर आप इस गाने का वीडियो देखते हैं, तो एडिट इतना खराब है कि कहीं-कहीं आपको हज्जाम शब्द का 'ह' सुनाइ देता है. यह न केवल अजीब बल्कि भद्दा भी लगता है, क्योंकि गाने में कई बार अचानक से खाली स्थान आ जाता है.
एक और ऐसा ही उदाहरण है गुलज़ार द्वारा लिखा गया एक और गीत फिल्म 'आजा नचले' से है जिससे लाखों दिलों पर राज करने वाली, नृत्य सुंदरी, माधुरी दीक्षित ने फ़िल्मों में वापसी की थी. यहां शीर्षक गीत में मूल रूप से एक पंक्ति थी मोहल्ले में कैसी मारामार है, बोले मोची भी खुद को सुनार है जिसे बाद में लोगों की आपत्ति के कारण फिल्म में बदलकर मोहल्ले में कैसी मारामार है, मेरे दर पे दीवानों की बहार है ऐसा कर दिया गया. मज़े की बात यह है कि उपरोक्त दोनों मामलों में (या इसी तरह का कोई अन्य मामला जैसे राम-लीला, पद्मावती, पृथ्वीराज का नाम बदलकर क्रमशः गोलियों की रास लीला: राम लीला, पद्मावत, सम्राट पृथ्वीराज कर दिया गया था) आपत्ति हमेशा दर्ज होती है रिलीज़ से कुछ दिन पहले या अक्सर उसी सप्ताह में. अब फिल्मों के शीर्षक का प्रचार किया जाता है और फिल्म रिलीज़ से बस कुछ दिन पहले. फिल्म का शीर्षक, फिल्म के गाने बहुत पहले जारी हो जाते हैं. गाने मूल शब्दों के साथ सुने, पसंद किये जाते हैं और लोकप्रिय होते हैं. लेकिन आपत्तियां अंतिम समय में ही आती हैं. कैसे? क्यों? इसे समझने के लिए किसी को शरलॉक होम्स बनने की आवश्यकता नहीं है. ज़ाहिर है, आखिरी वक़्त पर आपत्ति करने का कारण सौदेबाज़ी (ब्लैकमेलिंग कह सकते हैं) और कुछ लाभ हासिल करना है.
इसके बाद आते हैं कुछ ऐसे गीतों पर जिनमें प्रत्यक्ष रूप में द्विअर्थी शब्द हैं लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वो बख्श दिए गए. उनमें से कुछ हैं, फिल्म विधाता का सात सहेलियां खड़ी-खड़ी, तथा उसके अलावा पड़ोसन अपनी मुर्गी को रखना संभल, मेरा मुर्गा हुआ है दीवाना (जानकार हैरानी होगी कि इसे अमिताभ पर फिल्माया गया था) / ये मालगाड़ी, तू धक्का लगा / चोली के पीछे क्या है / हम तो तंबू में बंबू लगाये बैठे (इसमें भी अमिताभ) / भाग भाग डीके बोस / खड़ा है खड़ा है, तेरे डर पे खड़ा है / चढ़ गया ऊपर रे, अटरिया पे लोटन कबूतर रे , तेरी ले लूं, बाहें, बाहों में (दादा कोंडके की फिल्म जो आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि वह अपनी मराठी फिल्मों में बहुत सारे दोहरे अर्थ वाले संवादों और गीतों का उपयोग करने के लिए जाने जाते थे. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने लगातार सात सिल्वर जुबिली फ़िल्में देकर रेकॉर्ड बनाया). बल्कि, मुझे तो लगता है कि अगर कोई किशोर और आशा का गाया, आंखों में क्या जी? रूपहला बादल… गौर से सुने, तो उन्हें शायद आखिरी पंक्ति से लेखक के शरारती इरादों का आभास हो सकता है, और ये पंक्ति है आँचल में क्या जी?… अजब सी हलचल.
ऐसे और कई गाने हैं जिनमें गीतकार के शरारती आशय का अनुमान लगाना ज़्यादा मुश्किल नहीं है. यदि ऊपर उल्लेखित सारे गीतों को देखा जाए, तो यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि अधिकांश मामलों में, विरोध केवल स्वार्थी कारणों से होता है या सम्बंधित अधिकारी किसी भी विवाद से बचने के लिए एक सुरक्षित रास्ता अपनाते हैं जिससे उनपर किसी एक पक्ष के प्रति पूर्वाग्रह रखने का आरोप न लग पाए.
आशा है ये लेख पढने में दिलचस्प लगा हो. उपरोक्त लेख वर्षों से फ़िल्म-प्रेमी होने के नाते मेरे द्वारा देखने, सुनने, पढ़ने और अनुमान लगाने का नतीजा है. इसपर कृपया बेझिझक टिप्पणी, प्रशंसा या आलोचना करें, या फिर उससे बेहतर है कि यदि ऐसा कोई गीत छूट गया है, तो बताएं या ऊपर चर्चा किए गए गीतों में कोई बात या मुद्दा रह गया हो, तो उसे जोड़ें.
धन्यवाद
धर्मेंद्र जैन
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